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Tuesday, April 12, 2016

दिनकर को नहीं जानती ??

Feb 27, 2016 7:18pm
दिनकर को नहीं जानती ??

पार्लर का दरवाजा जैसे ही खोला देखा , दोनों कुर्सियों पर दो महिलाये बैठी हुई है . स्पस्ट था की मुझे इंतज़ार करना होगा , इसलिए ज्यादा न सोचते हुए पार्लर के पीछे की तरफ रखे गद्देदार बेंच पर थोड़ा दाए तरफ तिरछे हो कर बैठ गयी , क्योकि बाए तरफ कुछ सामान रखा था . बैठते ही पास रखे एक मैगज़ीन को उठा कर कुछ पन्ने पलटे ही थे की सामने दाए तरफ बैठी महिला सामने लगे आईने में दीख गयी. देखते ही नज़र थोड़ी देर के लिए रूक गयी उन्हें देखने के लिए , वह महिला थी ही इतनी सुन्दर . काश हाथ में कैमरा होता , चुपके से एक क्लिक कर लेती ऐसा एक बार मन सोचा था , वैसे आज भी उनकी सूरत मन के कैमरे से जो क्लिक किया था , सुरक्ष्हित है . गोरा रंग सिर्फ कहू तो कम होगा , लग रहा था जैसे वे हलकी गुलाबी रंग की हो , उम्र शायद मैं कम ही आंकती , पर मेरे दाए तरफ रखे बेंच पर उनकी छोटी बहन बैठी थी जो स्पस्ट रूप से पचास से ऊपर लग रही थी और उन्हें बात बात में दी, दी कर रही थी , इसलिए मन उम्र को लेकर भले ही आश्वस्त हो गया की वे बड़ी है, पर उनकी सुंदरता इस वजह से कहि भी कम नहीं लगी . सूरत पर थोड़ी भी उम्र की कोई सीकन नहीं न कोई दाग ...इंग्लिश में कहे तो फ्लॉलेस स्किन , होठ पर लिपस्टिक हलके लाल रंग की , ललाट पर छोटी सी लाल बिंदी .हलके टेढ़े मांग में थोड़ा सा लाल सिन्दूर , पतली सी भौहे , आँखों में हल्का काजल और उन सबसे ऊपर बहुत ही मधुर मुस्कान होठो पर, जो लग रहा था मानो , उनके पुरे सूरत पर बिखरा हो रौशनी की तरह . आँखे मुस्कुरा रही थी की होठ, कह नहीं सकते थे . देखने हुए सोचने लगी की इन्हे क्या करवाना है , सब कुछ तो करा धरा है , तब ध्यान गया की वे अपने बालो की हलकी छंटाई करवा रही थी और शायद इसके पहले भौहे भी सेट करवाई .

सामने आईने में लगातार देखना अच्छा नहीं लगता , इसलिए नज़रे निचे कर मैगजीन का पन्ना पलट्ने लगी , कोई जयादा दूरी तो थी नहीं इसलिए कुछ बाते न चाहते हुए भी कान में पड़ने लगी और ध्यान भी जाने लगा . बगल वाली बाई कुर्सी पर एक हलके सावले रंग की लड़की थी जो अपने बाल को कोई नया रूप दिलवा रही थी ,बगल में में उसकी माँ भी बैठी थी . मेरे आने से पहले लगा की सभी में जिसमे पार्लर की मालकिन और उसकी सहायिका भी थी सभी में , एक औपचारिक बात चित शुरू हो गयी थी और मेरे आने तक एक लय में बातचीत बही जा रही थी . माँ बेटी दोनों इस सुन्दर महिला को मैम कह कर सम्बोधित कर रहे थे , मुझे ज्यादा देर न लगी ऐसा क्यों हुआ होगा . मैम काफी सवाल बिल्कुल एक शिक्षिका की तरह उस लड़की से किये जा रही थी . वह लड़की कही से BCA कंप्यूटर कोर्स कर रही थी और उनकी बातचीत से पता लगा कि यह सुन्दर महिला अमेरिका में रहती थी , पटना अपने बहन के घर आई हुई थी किसी शादी में जाने के लिए, जो बिहार में कहि किसी शहर में था. वे पटना में ही पली बढ़ी और पढ़ी थी . बड़े ही प्रसन्नचित भाव से वे प्रश्न कर रही थी और वह लड़की और उसकी माँ भी बड़े आदर भाव से उसका जवाब दे रहे थी. जैसे ये कोई पार्लर नहीं कक्षा हो और वे दोनों विद्यार्थी .

पर कोई भी लय हो कही तो उतार चढाव तो आना ही होता है , ऐसा मै मानती हूँ और इस बातचीत में भी व्ही हुआ . उन्होंने बातचीत में ये बता दिया की वे ६० से ऊपर की महिला है . लड़की ने पुछा की आपके सुंदरता का राज क्या है तो वह बोली की मैं कभी भी मेकअप नहीं करती, बहुत हुआ तो वैसेलिन लगाती हूँ . तभी अचानक उस लड़की की माँ ने पूछ दिया मैम आज इस उम्र में आप गजब ढा रही है , जवानी में तो आपके घर के आगे लाइन लगी होती होगी , इस पर उनकी छोटी बहन जो मेरे दाए तरफ के बेच पर बैठी थी बोल पड़ी , अरी मत पूछो . बहुत मुश्किल होती थी कॉलेज जाना . तभी पता चला वे पटना विमेंस कॉलेज में पढ़ी थी ( ये कॉलेज आज भी पटना का बहुत ही विख्यात महिला कॉलेज है ) पर वह जमाना अलग था , इतनी स्वतंत्रता नहीं थी , घर से पूरी नज़र रहती थी . फिर लड़की की माँ बोल पड़ी आपकी शादी हुई होगी तो कितनो के दिल टूटे होंगे , तब मुझे अभी भी उनकी सूरत याद है वे उस उम्र में भी शर्मा गयी थी और एक मनमोहक से हंसी आई उनकी सूरत पर , ये सब मैं सुनते हुए सामने आईना देखना बिल्कुल नहीं भूलती .उन्होंने कहा था , पता नहीं किसके दिल टूटे मैं तो स्टेट्स चली गयी और फिर वह की लाइफ , कहा पीछे देखने का मौका मिलता है .
फिर भी मैम कोई तो घटना होगी न जो आपको याद होगा जब कोई आपकी सूरत को देखता ही रह गया हो ये प्रश्न लड़की ने कर दिया ,

ये सुनते ही उनकी छोटी बहन बोल पड़ी , अरी दी याद है जब रामधारी सिंह दिनकर आये थे , स्टेज पर सभी आपको देख रहे थे ,
अरी हां , बड़ी बहन ने हामी भरी और रामधरी सिंह दिनकर जी ...

अभी वाक्य पूरी हुई भी नहीं थी की लड़की ने पूछा ये रामधारी सिंह दिनकर कौन है ..

तुम नहीं जानती ...वह सुन्दर महिला जो अब तक प्रसन्न चित मुद्रा में थी बिल्कुल गंभीर हो गयी ..स्कूल में नहीं पढ़ा , कॉलेज में नहीं पढ़ा उनके विषय में , वे बिहार के ही नहीं भारत के महान हिंदी कवि में गिने जाते है ...लगा की जैसे पार्लर आज क्लासरूम हो ही गया , मैं भी जो इस बातचीत का आनंद ले रही थी, सहम गयी .

मैम कोचिंग और अपने कंप्यूटर कोर्स से फुर्सत मिले तो ये सब याद रहे ...स्कूल में शायद पढ़ा हो , अब तो सिलेब्स भी बदल गया है ...

अरी आप तो पढ़ी होंगी ...लड़की की माँ की तरफ मुखातिब होकर पूछा

अरे मैम बाल बच्चो से घर गृहस्थी से फुर्सत मिले तो ...पढ़ा होगा ..याद नहीं ...

पार्लर वाली जो उनके बाली की त्रिम्मिंग ख़त्म ही करने को थी बिना पूछे ही बोल पड़ी ...अपने काम कस्टमर से फुर्सत कहा मिलती है मैडम जो पढ़ाई हो इन सबकी और याद भी रहे ..

मै माँ , बेटी और पार्लर वाली की बात और बहाने सुन अंदर ही अंदर हंस रही थी और मैगज़ीन के पन्ने को यही उलट प्लाट रही थी

क्या बात करती है ..आप लोग पढ़ी लिखी है ...मैं भी घर गृहस्थी वाली महिला हूँ ..अपने राज्य और देश के बारे में जानना चाहिए ...सुन्दर महिला की ललाट पर सिकन हलकी सी आ गयी थी ..मुस्कान तो लगा जैसे पार्लर का दरवाजा खोल रफूचक्कर हो गयी थी .

हमारे वक्त तो , दिनकर की कविता का बिना कोई भी हिंदी का सिलेब्स पूरा नहीं होता था , बचपन से लेकर कॉलेज तक ...क्या अब नहीं पढ़ाई होती ...

पता नहीं अचानक मुझे क्या हो गया मैं बोल पड़ी ..." क्षमा शोभती उस भुजंग को , जिसके पास गरल हो "

इतना सुनते ही वह सुंदर सी सूरत जिसे मैं इतने देर से आईने में देख रही और जो अब तक शिकन से भर गयी थी , कुर्सी पर बैठ ही मेरी तरफ मुड़ी और अपनी प्यारी सी मुस्कान से मेरा मौन अभिवादन किया ...मैंने भी मुस्कुरा कर ही जवाब दिया
हां ..आपको पता है ...पढ़ाई होती है न अभी भी ...दिनकर की कुछ पुस्तको का नाम लिया ...तब तक वे उठ चुकी थी कुर्सी से ..

जी पढ़ाई होती है अभी भी ..बिहार दिनकर को कैसे भूल सकता है ..
हां ...बहुत ही महान कवि ..उनकी रचनाये अमर है ...उनका कुरुक्षहेत्र हिंदी की महानतम रचनाओ में एक है ..
जी ...मैं कुछ ज्यादा बोल न सकी ..उन्हें देखती रही ...वे मुस्कुराते हुए जा रही थी ..एक अजीब सा शुकून मिला ...ध्यान दिया चलते हुए थोड़ी दिक्कत थी उन्हें ..व्ही उम्र का असर होगा ..पर एक अफ़सोस रहा उनके कॉलेज वाली कहानी अधूरी रह गयी. हिम्मात मेरी तो नहीं थी की पुछू ..जिन्होंने पूछा था वे फिलहाल मौनव्रत धारण कर चुके थे ..

उनके जाने के बाद उनकी कुर्सी पर लड़की की माँ बैठ गयी , उन्हें अपने भौहे सेट करवानी थी.मतलब मुझे और दस मिनट बैठना होगा ..ये सोच मैगज़ीन को गंभीरता से पढ़ने लगी क्योकि अब सामने आईने में कोई सूरत ऐसी थी नहीं कि देखू

दिनकर पर फिर कोई बात नहीं हुई उसके बाद ,न मैंने ही छेड़ा , माँ बेटी और पार्लर वाली इसी बहस में लग गए की वह महिला साफ़ झूठ बोल रही थी कि वह कोई मेकअप नहीं करती . पार्लर वाली ने मुझे भी उस बहस में शामिल करने कि पूरी कोशिश कि उन्होंने कुछ एडवांस सेर्जेरी मेकअप अमेरिका में ही करवाया होगा नहीं तो इस उम्र में ऐसा स्किन हो ही नहीं सकता ...
मैंने सिर्फ हामी भर दी " हां हो सकता है ...मार्किट में बहुत कुछ आ गया है , पर सब कर के भी इतना आसान नहीं है सुन्दर होना..."

नजरिया

नजरिया
नौकरी छोड़ने के बाद , मैं उस कंपनी के एच आर के कहने पर उस दिन कार्यालय गयी थी . उन्होंने मुझे कुछ देर रुकने को कहा , क्योकि वहा और भी लोग आये हुए थे मेरे पहले .अपने अपने काम से. मैं इंतज़ार करने के लिए वहा बने बहुत ही बड़े हालनुमा बैठक में लगे करीब २५ से ३० कुर्सियों की लम्बी दो कतार जो एक कोण में बना रखे थे , उनमे से एक कतार की कुर्सी का चयन कर बैठ गयी. थोड़ी देर अपने हाथ में जो फाइल थे उनके कागज़ उलट पलट कर सर उठाया तो , कुर्सी की दूसरी कतार में बैठे एक शख्स , जिन्हे मैं नाम और शक्ल से जानती थी, पर जान पहचान नहीं थी , वे मुझे हलकी मुस्कराहट लिए देख रहे थे. थोड़ी असहजता हुई, तो फिर अपने को हाथ में रखे कागज में उलझा लिया.

ये महाशय मेरे ही प्रोसेस में काम करते थे और मेरे नौकरी छोड़ने के करीब एक महीने पहले ही नौकरी छोड़ चुके थे क्योकि इनकी नौकरी "विप्रो" के इंटरनेशनल कॉल सेंटर में लग गयी थी . जब ये खबर आई इनकी नौकरी वहा लग गयी थी , तब ही, इनके विषय में कुछ जान पाई थी . प्रोसेस में मेरे शिफ्ट के वक्त कोई इनका मित्र होगा , उसी ने हल्ला किया था " साले की विप्रो में नौकरी लग गयी , वहा ऐसे ऐसे को भी लेते है पता नहीं था" फिर काम करने की जगह पर ही बहुत ही मजाक शोरसराबा हुआ था. पर मेरा कुछ खास मतलब नहीं था. दोस्त है ये सब ,बात अपने दोस्तों के लिए करते रहते है . पर ये सब कुछ एक महीने पहले ही हुआ था , इसलिए इन्हे देख कर सब दिमाग में ताज़ा हो गया . जिस प्रोसेस में तीनो शिफ्ट मिलाकर रजिस्टर्ड १८० लोग काम कर रहे हो और पूरी कंपनी का जोड़े जहा अच्छे खासे प्रोसेस चल रहे हो तो ये आना जाना कोई मायने नहीं रखता . न कंपनी के लिए न वहा काम करने वालो के लिए .

पर जिस व्यक्ति से मेरा कोई वास्ता न हो , वह मुझे देख मुस्करा रहा हो तो थोड़ा तो अजीब लग्न स्वाभाविक है . जैसे ही सर उठाया फिर तो वे महाशय इधर ही घूर रहे थे, मै ज्यादा कुछ सोचती, वे अपनी जगह से उठकर मेरी तरफ आ गए और एक सांकेतिक अभिवादन करते हुए मेरे बगल वाली कुर्सी पर विराजमान हो गए .

आप यहाँ ..कोई काम है ..वेतन तो नहीं फंसा...उन्होंने हलकी मुस्कराहट लिए पूछा
हां , मैंने नौकरी छोड़ दिया एक हफ्ता हुआ ...आखरी महीने का वेतन रुका है ..
अपना भी यही मामला है ...थोड़े इत्मीनान हो गए अपनी कुर्सी पर
आप तो विप्रो में है न...
हां ...वहा पता है मैडम वेतन का कभी कोई प्रॉब्लम नहीं होता ..ये कंपनी सब कुछ तो बड़ा कर लिया पर इनका एकाउंटिंग और एच आर बहुत घटिया है ...मैंने "दक्षः" में भी काम किया मैडम ( जो नहीं जानते हो , इंटरनेशनल कॉल सेंटर में विप्रो , दक्षः, GE उस वक्त क बहुत बड़े नाम थे ..शायद आज भी हो ) वहा भी वेतन को लेकर कभी प्रॉब्लम नहीं हुई ...
मैंने उत्सुक हो कर पूछ बैठी ...अरे आप वहा भी काम किये ...क्यों छोड़ा ..
अरे मैडम छोड़ा नही ...उनकी ट्रेनिंग क्वालीफाई नही कर पाये ...पर तीन महीने वेतन तो मिला और कुछ सधार तो हुआ ही उनकी ट्रेनिग से ...विप्रो में भी हमें पता है क्वालीफाई नहीं कर पाएंगे ..मैडम हम ठहरे इलाहाबाद के ठेठ और ये सिखाते है की इंग्लिश ऐसे बोलो वैसे बोलो ...अपनी तो जीभ ही नहीं पलटती उनकी तरह ...जीभ पलट कर दिखाने लगे ...
मुझे हंसी आ गयी ...उनकी ये हरकते देख कर . बहुत ही सहज होकर बोल रहे थे जैसे वे मुझे जानते हो , उनकी इस सहजता ने हमारी वार्ता को बढ़ाने में मदद की .
पर ३०००० महीना वेतन दे रहे है ...मस्त है ..समझ लीजिये ये तीन महीने मुफ्त का खाना का इतंजाम हो गया ...है न गजब के लोग ये ..इतना वेतन हमें कौन देगा और कही ...आप अब कहा नौकरी कर रही है
कही नहीं ..
तो क्यों छोड़ दी लगी लगाई नौकरी ...
नहीं मेरा मैनेजमेंट कोर्स का दो सेमेस्टर पेंडिंग हो गया है ...दो साल हो गए ..इस बार चुके तो तीन साल हो जाएंगे ...पुरे ९ पेपर दूंगी तो पढ़ने के लिए समय चाहिए ...नौकरी और पढ़ाई एक साथ नहीः हो पाती मेरे से...
अरे छुट्टी ले लेती ..
नहीं बस हो गया इंटरनेशनल कॉल सेंटर का जॉब ...
तो मैनेजर बनना है ...मुस्कुराते हुए कहा
नहीं ...ये तो कॉरेस्पोंडेंस कोर्स है ...रेगुलर वालो को प्लेसमेंट नहीं मिलती ..हमें क्या मिलेगी ...देखते है क्या होना है ...

एक बात पूछे मैडम , बुरा नहीं मानियेगा ...
जी बोलिए क्या पूछना है ...
क्या आप मुसलमान है ..??
अचानक हो रही एक सामान्य बातचीत के बीच ये सवाल मुझे अचंभित कर गया ...फिर भी खुद को सामान्य बने रहने की पूरी कोशिश करते पूछा ...नहीं मैं मुस्लिम नहीं हूँ ....ऐसा क्यों लगा आपको ?
आपके कपडे के रंग के चॉइस की वजह से ...एक अजीब सी मुस्कान दिखी उनकी शकल पर ये बोलते हुए
कैसा रंग कौन चॉइस ...मै हिन्दू हूँ , मेरा नाम हिन्दू की तरह है ... ( इन्हे मेरा नाम नहीं पता था )
तो आप हमेशा काले रंग का ही कपडा क्यों पहनती है ...मै यहाँ तीन महीने काम किया और पाया की आपके ८० तो ९० % ड्रेस काले ही रंग या उसी के कॉम्बिनेशन के थे ...अभी भी देखिये आपका ड्रेस काल रंग में है ...
तो काला मुसलमानो का रंग होता है ...
ये बोल मन ही मन सोचने लगी , ये इंसान जिसे मैंने शायद तीन या चार बार ही अपने शिफ्ट मैं देखा वह मुझे इतना ज्यादा ओब्सेर्वे करता रहा ...सच में मै अपने पिछले कुछ महीने के ड्रेस को दिमाग में सरसरी तौर पर याद करने लगी तो वाकई सब में कला पायजामा और दुपट्टा तो था ही ... फिर खुद को समझाया मेरी मर्जी , कुछ भी पहनू ...खुद को झट धरातल पर लाई और एक और सवाल ठोंक दिया
प्रोसेस में दो टीन और भी तो मुस्लिम लड़की तो आपने देखा ...वे तो काला नहीं पहनती ...
अरे वे तो मॉडर्न मुसलमान है ...आपके ड्रेस उन रियल मुसलमान लड़कियो जैसे होते है ...अगर आप मुसलमान नहीं तो तो उनका प्रभाव रहा होगा ..कोई दोस्त ..माहोल ...
नहीं मेरी कोई भी मुसलमान दोस्त नहीं न ही कोई वैसे माहोल मेंं पाली ...मैं शुद्ध वैष्णव हिन्दू परिवार से हूँ ..( बोलते बोलते रुक गयी ...इसे मैं सफाई क्यों दे रही हूँ ..बकवास लगता ही नहीं बकवास सोच भी इसकी ...)
तो आप ब्राह्मण है ...
नहीं ....बहुत ही रुखाई से बोला
तो कौन जात है आप
गेस कर ले ( मन में गरियाते ...आ ही गए औकात पे )
परसाद है तो बहुत मुश्किल हैं गेस करना ...सब जात ये सरनेम रखता है ...
जी ...
लालू वाला प्रसाद आप नहीं
क्यों ...
अरे हम जानते है न मैडम आपको ...आप वे वाले प्रसाद नहीं है ...यादव आप नही है ..हम दुनिया देखे है ...जात किसी का तुरंत पहचान जाते है ( अभी थोड़ी देर पहले मैं इनके लिए मुसलमान थी )
- बहुत गंभीर हो कर वे गेस कर रहे थे और मैं गंभीर होकर अब एच आर के विलम्ब से और इस महाशय के बकवास से आपे से बाहर होते हुए भी खुद को संभाला हुआ था ...
आप लालू प्रसाद है नहीं , साउथ इंडियन भी नहीं ..बनिया भी नहीं ...कहि आप कायस्थ तो नही ...
जी ...
तब तो अपनी बिरादरी वाली हुई न ( उनका सरनेम श्रीवास्तव था )...आपको बताना चाहिए था न...कितना गेस किया ...आप वैस्नव परिवार में है और कायस्थ भी ....बहुत दिक्कत होगी आपको शादी में ..
क्यों क्या हुआ??? मुस्कुराते थोड़ा झेंपते हुए पूछ लिया ...
कायस्थ लोग नॉन वेज मुसलमान की तरह खाता है ...यहाँ UP में तो वेज खाने वाला कायस्थ मिल भी जायेगा...आपके बिहार में तो बहुत मुश्किल है ...
जी पता है ...
कही और शादी करनी होगी आपको ....
सिर्फ मुस्कुरा कर जवाब दिया उन्हें ...
इस वार्ता के पुरे होते होते तक मैं इस महाशय को शायद ठीक से देखा पहली बार ..पांच फ़ीट दो या तीन इंच के होंगे ...हलके सावले , चश्मे में छिपी आँखे और थोड़ी टेढ़ी जुबान जब बोलते ख़ास कर ...
बात थोड़ी क्लाइमेक्स तक पहुँच गयी थी...बात बदलने की सोच कर पूछ दिया ..कॉल सेंटर का ही जॉब करना है हमेशा ...
नहीं ...मैडम मेरा तो ड्रीम लंदन है ...एम ऐ कर के यहाँ आये ...इसलिए तो अपना इंग्लिश सुधार रहे है ...एक दिन लंदन जरूर र जायेंगे ...
जी ..बिल्कुल जा पाएंगे ....जितना इंग्लिश जानते हैं उससे भी जाया जा सकता है ....
सही कहा ...पर पैसे भी तो चाहिए ...
हो जाएगा वो भी ...आल डी बेस्ट ..
थैंक्स ...आप तो मैनेजर बनियेगा ....दोनों हंसने लगे
तभी एच आर से किसी ने मेरे नाम पुकारा ...झट उठ महाशय से विदा ले एच आर के कमरे तरफ चल पड़ी ...काम होने पर बाहर निकलते ही उनपर नज़र पड़ी . हाथ उठा बाए कर वह से निकल गयी या कहिये भाग निकली ....ईश्वर की कृपा से फिर कभी मुलाकात नहीं हुई उनसे ...
पर हां आज भी काले ड्रेस पर उनका नजरिया और साथ हुई बात याद आती है . उस वक्त मैंने सच में बहुत ज्यादा ही काले ड्रेस पहने थे , पर कोई इतना ध्यान से देख रहा होगा , ये कल्पना नहीं की थी . दुनिया की भीड़ में कौन हमें कौन से रूप में और कौन से नज़रिये से देख रहा है , हम में से किसी को पता नहीं .

शादी का आलू का सौंदा

शादी का आलू का सौंदा

आजकल बाजार में सीम / सेम खूब उतरा है , जब जाते है एक पाव् ले आते है सौंदा बनाने के लिए . घर में सब को बहुत पसंद है , माँ को तो इतना पसंद था की दाल चावल सौंदा ही खाती , सब्जी एक तरफ रख देती . आखरी दिनों में तो सौंदा जरुरी हो गया था , खास कर सीम का , क्योकि वे सिर्फ व्ही खाती . माँ की वजह से सौंदा से भावनात्मक लगाव भी है , इसलिए जब तब सौंदा बना डालते है , यादो में माहोल में माँ सा अहसास होता है . गोत्राील सीम का सौंदा तो और भी अच्छा लगता है घर में सबको ,गोत्राएएल का मतलब जिस सीम में बीज जरा बड़े और मोटे होते है , चिपके बीजो को तुलना में . बिहार के मित्र और शायद उत्तर प्रदेश वाले भी सौंदा का अर्थ समझ रहे होंगे , जो न समझे उन्हें पहले तो सौंदा क्या है ये बता दू तब आगे बढ़ू. सौंदा का अर्थ " इंस्टेंट आचार " , जो आचार तुरंत ही खाने लायक हो और बिना वक्त लिए बन भी जाए . नमक पानी में सीम को उबालो फिर पानी निकाल ले और उसमे पिसा सर्सो,हल्दी, तेल और मिर्च मिला दिए और हो गया तैयार सौंदा . सौंदा सिर्फ सीम का ही नहीं बनता , आलू और मूली का भी बनता है . मैं तो जब नए फूलगोभी बाजार में आते है उसके डंठल के मुलायम भाग से रेसे निकाल , उबाल कर भी सौंदा बनाया है . बहुत ही सोंधी खूशबू आती है सौन्दे से , गरम चावल दाल के साथ तो स्वाद दुगुना कर देता है . सौंदा ठण्ड में मैं दो से तीन दिन में ख़त्म कर देती हूँ और गर्मी में तो उसी दिन कोशिश करती हूँ की ख़त्म हो जाए . क्योकि तुरंत उबाल कर मसाला मिलाया जाता है तो गर्मी में तो सौंदा तो बारह घंटे में ही ख़राब होने लगता है , ठण्ड में फिर भी तीन चार दिन तक संभल जाता है सौंदा .

मई या जून रहा होगा , हमलोग सपरिवार एक शादी में अपने एक नज़दीकी रिश्तेदार के यहाँ गए थे, शादी में अक्सर लोग शादी की बाहरी तयारी का बहुत जायजा लेते है . कैसा सजा है , कहा जनवासा होगा , कहा द्वार लगेगा , कौन क्या पहनेगा. वे क्या खा रहे है इसपर कम ही ध्यान रहता है और लड़की की शादी हो तो और ज्यादा ही लचर हो जाता है ध्यान . अक्सर जो लोग शादी में आते है वे शादी के दिन के लिए तयार होने में इतना खोये रहते है की वे क्या खा पी रहे है उसका ख्याल नहीं रहता . ये उन दिनों की बात है जब शादी होटल और हॉल में नहीं होती थी , घर के आस पास के मैदान और आँगन छत से ही काम चल जाता था ...किसी तरह बाराती के लिए कही हाल या घर लिया जाता था.

मैं जैसे अपने रिश्तेदार के घर पहुंची , सीधा थोड़ी हाथ मूह धो रसोई में चली गयी ( उनके यहाँ आप जितनी जल्दी रसोई में भीड़ जाए , आप उतने ही अच्छे है और हम इस मौके से चूकते नहीं grin emoticon ..रसोई में जैसे ही पहले कदम डाला की लगा नाक में कॉर्बन छोड़ते ही ऑक्सीजन की जगह नाइट्रोजन / मैंगनीज पता नहीं क्या सांसो से भीतर गया ...लगा की दम घूँट जायेगा ...वह घर की बड़ी दीदी काम कर रही थी , सोचा की पुच्छू , पर माँ की हिदायत याद रहती , अपनी जुबान पे कंट्रोल रखना , जाने कहा क्या बोल दे , शादी का घर है ...पर दम तो निकले जा रहा था , धीरे धीरे बिना पूछे वह बने खाने के सारे बर्तन को पलट कर देखने लगी , अचानक निचे रखा बड़ा तसला ( गोला डेकची कह सकते है ) पैर से टकराया , ढक्कन हटते ही लगा की कोई केमिकल फैक्ट्री का दरवाजा खोल दिया झट से बंद कर दिया ..

.मैं कुछ बोलती दीदी ने बोला ...आलू का सौंदा है , तीन दिन पहले ही बना दिया सौंदा , सब लोग आएंगे न ...आचार तो तुरंते ख़त्म हो जायेगा , सौंदा चला दिया जायेगा थोड़ा थोड़ा ...यहाँ तो पता है न कितना लोग आते है , सारे रिश्तेदार तो यही रहते है , गाँव से भी आना जाना खूब होगा ...
हां , सही किया ...यहाँ तो सच में बहुत लोग आते है , सारे मामा के परिवार से तो आएंगे ही ...अभी तो सारे चाचा का परिवार भी यहाँ है ...वहा भी शादी है ...मैं उनकी बात में हां तो मिला दिया और थोड़ी देर में सौन्दे की गंध में सामान्य भी हो गयी पर झट से याद आ गया मेरा परिवार , दौड़ कर माँ पापा भाई के पास गयी की कोई भी आलू से सौंदा नहीं खायेगा , चार दिन पुराना है , खासकर पापा को चेताना जरुरी था , वे चुपचाप कुछ भी दो , खा लेते है , भले ही बाद में तबियत ख़राब होने की बात करे .
जिस दिन हम गए , उसके दुसरे दिन से शादी के विध सब शुरू हो गए , काफी रिश्तेदार आये , दोपहर के खाने के वक्त जब खाना परोसा जाता तो आलू का सौंदा भी चलाया जाता , कुछ ये पूछते क्या है ...आलू का सौंदा...ठीक ठीक है दे दो ...दिल थोड़ा सहम कर दो आलू का टुकड़ा परोस देते ...

एक बार उनके तरफ से एक मामा ने टोक भी दिया ...का रे सड़ गया है क्या सौंदा , तभी कोई दीदी बोली नहीं ...सड़ा नहीं है ...पूरा धुप दिखाए छत पर तब बना है सौंदा ...( मैं मन में मुस्कुराती रह जाती )
मै खाना परोसते वक्त पूरा ख्याल रखती मेरे परिवार को ये सौंदा न मिले , हो सके तो मैं ही परोसती .
शादी में हमलोग करीब एक सप्ताह से ज्यादा रहे थे , सौंदा लगभग रोज ही परोसा गया खाने में , सच कहू तो २०% लोग ही नहीं खाए , बाकी सब बिना बोले आराम से खाए वो सौंदा ...

Monday, August 10, 2015

पौलिना ...Story of Paulina

पौलिना ...

याद नहीं क्या वजह रही होगी पौलिना के पास बैठने की, आज पचीस तीस साल पुरानी बात को बिलकूल ज्यो का त्यों कह सकू मुमकिन नहीं . पर ये मुमकिन है कि जो बाते उस समय की थोड़ी भी याद है उसे आज की नज़र से देख सकू. पौलिना क्लास के पचहतर लडकियों में से एक थी , मै उसके पास शायद इसलिए बैठी क्योकि जब पीछे दिल किया की बैठू तो जगह उसी के पास दिखी . मुझे जीतना याद है वो छठी क्लास में शुरू दिन से नहीं थी , दो तीन महीने बाद आई थी दो तीन और संथाली लडकियों के साथ. उस वक्त की रमा के नज़र में सब लडकिया थी , सब दोस्त थी , सब सहपाठी थी, सब इक उम्र की थी , सब के क्लास में होने का एक ही मकसद - पढना कुछ और सीखना . मेरे सोच का दायरा उसके बाहर नहीं देखता था. पर पौलिना के पास बीठा कर जीवन ने मुझे अपने सोच के दायरों को तोड़ने का निर्णय लिया था शायद .

क्लास में शायद चार पौलिना थी , कोई हेम्ब्रम , कोई हंसदा कोई टुडू , कोई मरांडी मेरी इस पौलिना का शेष नाम क्या था याद नहीं , पर हां उसकी रूप रेखा आज भी मन मस्तिस्क पर साफ़ उभरी हुई है . वैसे तो आदिवासी लडकियों के रूप में इक अजीब सी चमक और लावण्या देखा जा सकता है , पर इसका रूप मुरझाया , आँखे गहरी थोड़ी झूरिया लिए हुए , बाल लम्बी पर हमेशा दो केला चोटी ( हमारे स्कूल में सबको इसी तरह से बाल बनाना था , चाहे दो उंगली लम्बे केश क्यों न हो ) तो आराम से कमर को छूती थी . अजीब सी छिपी हुई मुस्कान थी उसकी , स्वस्थ शरीर वाली पौलिना इक साधारण कद काठी की हलके सावले रंग वाली लड़की थी मेरे लिए . बहुत कम ही बात करती थी किसी से , और बाकी आदवासी लडकिय भी कुछ खास बात नहीं करती , टिफ़िन के वक्त बिलकूल गायब हो जाती थी .

बात कब कहा से शुरू की पौलिना से याद नहीं पर कुछ बाते जो मैंने उत्सुकता वश उससे पूछी थी , उसका जवाब उसने बिना लाग लपेट किये इतनी सहजता से दिया की मैं आज भी स्तबध रह जाती हूँ. इक दिन मैंने उससे पूछ दिया की तुमलोग को टिफ़िन टाइम में खाने के लिए ऐसा क्या दिया जाता है की वो गंध बर्दास्त नहीं होता . ये सवाल आदिवासी लडकियों और हम डेस्कोलोर्स के बिच इक बहुत ही बड़ा ही विवादास्पद प्रश्न था, जिसे मेरे पहले भी कुछ लडकियों ने पूछा अपनी आदिवासी दोस्तों से तो उन्हें मुह की खानी पड़ी उस प्रशन के उत्तर के रूप में . किसी ने इक बार पूछा तो उसे इक आदिवासी लड़की ने अमीरी गरीबी की बिच खिंची सारी रेखाए गिनवा दी थी. इक बार दो डेस्कोलार्स लडकिय उस खाने पर बात कर रही थी तो हमारे स्कूल की प्रिंसिपल जो इक नन / सिस्टर थी ने बहुत ही रूखाई से खबर ली थी .पर ये जटिल प्रश्न कई लडकियों के मन में तो रहा की ये भोजन इतना तीव्र गंध क्यों देता है . किसी ने बताया की ये गेहू का भात खाते है इसलिए , कोई बोला ये डबल बॉयल्ड चावल है ( मुझे उस वक्त डबल बॉयल्ड चावल का अर्थ बिलकूल समझ नहीं आता था ) पौलिना के चेहरे पर मेरे प्रश्न से कोई भी फर्क नहीं देखा , अरे रमा इतना लोग का खाना बनता है , सस्ता चावल गेहू लाते है , इसलिए महकता है , जो मिल जाए सब ठीक है , पर रमा ये बुरा नहीं है , सफाई से बनता है , शरीर पर लगता है , सब लडकिय गरीब घर से है , मुफ्त में पढाई लिखाई , खाना रहना आसान नहीं है . उसका ये जवाब मेरे दिमाग में छाये सारे दुर्गंध को कब का हटा चूका था. और पौलिना के लिए इक ख़ास जगह भी बन गयी थी कही दिल में .

डेस्कोलोर्स में शायद इक मैं ही पौलीना से बात करती थी और सच ये था की वह भी किसी से बात नहीं करना चाहती थी . पर उसका ये अलगाव क्यों था ये समझ नहीं आता . स्कूल में इतना वक्त नहीं की कोई इतना जवाब तलब करे , पर कुछ बात आज याद कर उन प्रशनो का जवाब मिलता हुआ सा लगता है . गर्मी छूटि या कोई पूजा की बड़ी छूट्टी होनी थी तो टिफ़िन क वक्त स्कूल के मैदान में आदवासी लडकिय जो अक्सर हॉस्टल चली जाती थी , पर उस दिन मैदान में फैली हुई थी और साथ दिख रहे थे कई लड़के . मैंने उन्हें देख ही रही थी पौलिना पर नज़र पड़ी , मैंने पूछ दिया ये सब इनके घर के लोग होंगे न पौलिना, छूट्टी के पहले मिलने या कुछ बात करने आये है ...
रमा तूम बच्ची हो , कुछ नहीं समझती , सबका यार आया हुआ है ...
यार , मतलब पौलिना..
यही बात करते क्लास में चले गए , घंटी बज चुकी थी , वो लडकिय भी धीरे धीरे मैदान से ओझल होने लगी . क्लास में पौलिना से पीछे के बेंच पर बात जारी रही .
यार ...नहीं समझी बुधू ...लड़का दोस्त है उनका ...अभी ही मिल सकते है न...फिर छूट्टी हो जाएगी तो नहीं मिल पाएंगे
मै बिना कुछ कहे उसकी बात सुने जा रही थी ..
तूम छोटी हो , नहीं समझती ..मैं उम्र में तुमसे बहुत बड़ी हूँ , तुम मेरा शरीर देखो , ये बड़ी लड़की का होता है , सामने के बेंच पर टेरेसा टूडू को दीखते हुए कहा वो भी बड़ी है तुमसे , मेरे से छोटी है..देखो उसका शरीर कितना भरा भरा है , .टेरेसा भी पौलीना के साथ ही आई थी , पर वह सामान्य व्यवहार वाली ही लड़की लगी . सुन्दर थी , पौलीना की तरह अलगथलग नहीं रहती थी , पर उस दिन पऔलीना ने मेरे नज़र का नजरिया उस उम्र के हिसाब से शायद ३६० डिग्री घूम चूकी थी . उसने मुझे आगे बैठी आरती हंसदा और सुचित्रा मुर्मू की गहरी दोस्ती का राज बताया . सुचित्रा कोई नेता की बेटी है , इस बार इलेक्शन हार गया , पैसे वाली है , आदिवासी होने से क्या होता है , आरती की इसकी इसलिए पटती है , दोनों का यार है , उसी पर दोनों खुसुर फुसर करते है .यहाँ लगबग सबका यार है रमा ...

आज की रमा होती तो पूछती पौलिना से तुम्हारा यार कहा है , शायद तुम्हारा नहीं आपका बोलती ,उसकी उम्र का अंदाज़ा हो चूका है मुझे वो पैतीस की रही होगी . शायद शादीशुदा हो या न भी हो , या पति छोड़ चूका हो . पता नहीं क्या क्या नहीं सोचा मैंने पौलिना को लेकर और सोचना भी लाज़मी था , इक बार उसने अपने विषय में बता ही दिया जिसकी वजह से उसकी यादो से और भी ज्यादा प्यार हो गया .

अक्सर वहा हॉस्टल की लडकिया बाल धोने के लिए स्कूल से इक या दो किलोमीटर दूर नदी में जाती थी , लौट कर वे क्लास में ही बालो में एक खास तेल लगाती थी. मुझे ऐसे उसका भी गंध बर्दास्त नहीं होता था, पौलीना से उस तेल के लिए पूछा तो वह तेल का बताते हुए अपनी कहानी बता दी . उसने बताया की उसके खेत में यही तेल होता है , याद नहीं पर पूछने पर बताया की चार काठा / बीघा / एकड उसका जमीन है . चार भाई और भौजाई है ..
.सब मारता था रमा , खाना कपडा भी नहीं देने लगा ..
जब फादर गाव आया तो उसको पता चला मेरे बारे में तो भाई से झगडा सुलझाया और जमीन मेरे नाम करवाया , फिर व्ही बोला की स्कूल में चलो पढने , तो हम तैयार हो गए और यहाँ आ गए पढने .
फादर पैसा देते है खेती का ...मैंने सीधे यही पूछ डाला
हां फादर पैसा देता है मुझे ...
सवाल आज कई है पौलीना से पूछने के लिए पर उस वक्त मैं चुप रह जाती थी . उसकी हर इक बात मेरे लिए नई थी , किसी से बोला नहीं , क्योकि इतना तो समझ गयी थी उसने मुझ पर विश्वाश किया था . आखरी बार मैं शायद आठवी या सातवी क्लास में एडमिशन के वक्त मिली जब पापा के साथ स्कूल गयी थी . उस वक्त हॉस्टल में काफी कम लडकिया थी , उसे जैसे देखा तो पापा को रूकने को बोलकर उससे मिलने गयी खेल के मैदान के ऊपर वाले हिस्से पर .मुस्कुराते हुए मिली .
तुम्हारा पापा है ?.
हा , मेरे पापा है ..एडमिशन के लिए आये थे ..

पापा की तरफ देखा ,वे बुला रहे थे ,मैंने पौलीना को बाय कर पापा के तरफ चल दिया ..कुछ बात हुई भी नहीं पीछे पलट कर हाथ उठाते फिर से बाय किया , उसने भी कंजूस वाली मुस्कान दी. ये नहीं पता था की ये आखरी मुलाकात है पौलीना से , क्लास शुरू हुआ पर पौलीना नज़र नहीं आई. शायद उसके लिए इस पढाई से खेती ज्यादा जरुरी हो , शायद शादी हो गयी हो , शायद कही फादर कोई नौकरी लगा दिए हो ...जब भी बैठती युही कितने शायदो की बारिश कर उसकी याद को साफ़ कर लेती हूँ ...

पौलीना ने मेरी सोच को इक नया आयाम दिया था ,आज उसे मैं अपने जीवन में व्यवहारिक दुनिया को दीखाने वाली प्रथम गुरु मानती हूँ .

ममता से दोस्ती

ममता से मुलाकात कोर्रेस्पोन्डन्स MBA कोर्स के पहले क्लास के दौरान हुई थी बात शायद उसी ने पहले की थी क्योकि उस दिन मेरे लिए सब कुछ नया और उत्सुकता से भरा हुआ था CP तक आना बेरसराय से और आकाशदीप बिल्डिंग को ढूंढना उस कनॉट प्लेस में और ग्यारव्ही मंजिल पर आयोजित पहले इंट्रो क्लास में आना, सब कुछ मेरे लिए नया था , एकदम नया था , उस नए अहसास ने मुझे मौन कर रखा था संयोग से लगभग सारे लोग जो उस सेंटर से इस कोर्स के लिए निबंधित थे , उनका आना हुआ सब अलग व्यवसाय और पृष्ट्भूमि के लोग , लगभग सौ लोग होंगे शायद दस पंद्रह महिलाये हो , अब तो ममता के सिवा कोई याद भी नहीं वह पांच फ़ीट सात इंच की होगी और और थोड़ी भारी भरकम काया की मालकिन .वैसे देखने में अच्छी थी . इक बड़ा सा पर्स ऐसे ले चलती थी जैसे वह पर्स नहीं बोरा हो जिसके बोझ से वह किनारे से थोड़ा झुक कर चलती. इक दो लाइन ही बात हुई होगी की पता चला की वह बिहारी मूल की है . वह शादीशुदा और इक तीन साल के लड़के की माँ थी ,उसने बताया की वह दो तीन अच्छी कंपनी में काम कर चुकी है पर अभी बेटे के छोटे होने की वजह से ब्रेक ले रखा है .

दूसरी मुलाकात में मैं उससे कुछ खुल पाई जब उसने पूछा की कही नौकरी के लिए प्रयास कर रही हो मैंने बताया की अभी प्रयास जारी है , इस बात पर उसने मुझसे किसी जॉब कंसल्टेंसी का नाम बता कर कहा की वह लोगो को उनकी प्रोफाइल के अनुसार जॉब लगवा ही देते है और अच्छे से मार्गदर्शन भी करती है मैंने पता माँगा तो कहा की वह फ़ोन नंबर उस कंसल्टेंसी का दे देगी. जब दिल्ली जैसे शहर में अकेले हो और नौकरी की चाह रखते हो तो ऐसे बाते दिल को तस्सल्ली देती है .

इधर मै नौकरी के लिए कुछ साक्छात्कार से गुजरी , कही सफलता लगी तो काम पसंद नहीं आया , जहा काम पसंद था उन्हें हम उपयुक्त नहीं लगे . थोड़ी निराशा घिरने लगी थी की ममता याद आ गई , मैंने उसको कॉल किया की उस कंसल्टेंसी का नंबर दे देती तो शायद कोई रास्ता निकल आये पर उसने फ़ोन पर कहा की नंबर तो ढूंढना होगा , बाद में कॉल करने पर वह नंबर दे देगी . ऐसा ही कुछ तीन चार बार हो गया फिर मैंने उचित समझ की मैं नंबर मांगने की गलती न ही करू तो अच्छा रहेगा मेरे लिए . इसी बीच इक छोटी से नौकरी मैंने कर ली . वीकली क्लासेज में ममता से मुलाकात हो जाती . मुझे देखते ही वह चहक उठती , क्लास में हुए इक इक टॉपिक पर विस्तार से बात करती मेरे से. मुझे उतना लगाव या इच्छा नहीं रहती बात करने की , पर चलो कोई तो बात करता है वाली हालत से गुजर रही थी , इसलिए आराम से झेल जाती थी . अगर किसी क्लास को वह मिस कर जाती तो दुसरे दिन या उसी दिन उसका कॉल आता की क्या हुआ , कौन सा टॉपिक पर चर्चा हुई .

इक बार "आर्गेनाईजेशन" और उससे जुड़े कुछ टॉपिक पर इक फैकल्टी आई थी. उन्होंने कुछ टॉपिक पर किसी किताब की फोटो कॉपी दी सबको . अब वीकली क्लास में बीस पचीस लोग ही आते थे . ममता उस दींन नहीं आई थी , उसने मुझे फ़ोन किया , मेरे द्वारा फोटो कॉपी दिए जाने वाली बात जानकर वह बेचैन हो गयी " रमा मेरे तो मिस हो गया न , कौन कौन से टॉपिक है क्या है " उसने इतना पूछा की मेरे मुह से निकल गया की " अपना पता दे दो मैं ये फोटो कॉपी कुरियर कर दूंगी " वह अचानक से शांत हो गई " सच में कुरियर कर दोगी, मैंने कहा हा , अपना पता दो . उसने मुझे अपना पता लिखवा दिया .दुसरे दींन मैं जब दफ़्तर गयी तो लंच ब्रेक में अपने बॉस से बहार जाने की इज़ाज़त मांगी तो पूछा की कहा जाना है , मैंने बताया की कुरियर करना है कुछ देर में लौट आएंगे . तो बॉस ने पूछा कहा का है , बताया की दिल्ली का ही है . तो उन्होंने मेरे हाथ से लिफाफा ले लिया कहा जा आराम कर मैं भिजवा दूंगा . यहाँ दफ़्तर से ढेर सारे कुरियर जाते है उसीमे ये भी चला जायेगा , मैंने पैसे निकाले तो कहा की " रमा ये दस बीस रूपये एडजस्ट हो जाते है इतने कुरियर के बीच . मैं थैंक्स बोल कर निश्चिन्त हो गई .

दो दींन के बाद ममता का कॉल आया . इतनी बात तो उससे अब तक हो ही चुकी थी की उसकी आवाज़ से उसकी मनोदशा को भांप लू. बहुत ज्यादा ही खुश थी ,
पहली पंक्ति फ़ोन पर थी " कुरियर मिल गया "
मेरा ठंडा सा जवाब था ठीक है , नोट्स मिल गए न , अब टेंशन नहीं लेना.
तुमने कुरियर कर दिया था ...
हा , तुम्हे कहा था , तुमसे एड्रेस इसी के लिए लिया था न ...
पैसे लगे न ......
ये बात उसकी अजीब तरह से मेरे जेहन में उतर गई ....ये दस बीस रूपये को लेकर इतना सोच रही है .. पर कुछ कहा नहीं ...
थैंक्स ...ममता ने अजीब विस्मयकारी ख़ुशी जाहिर की ..
तुमने कुरियर कर दिया ....और फिर इक खाली सा आवाज़ मनो कह रहा हो इस बड़े शहर में इतनी छोटी सी बात भी इतनी बड़ी बात मानी जाती है ...
रमा तुम अबी जॉब कर रही हो न
हा ...पर चेंज करना चाहती हूँ ..देखती हूँ
रमा तुम्हे वो कंसल्टेंसी बताया था न ,तुम वहा कॉल करना , अब तो तुम्हे एक्सपीरियंस भी हो गया है , वे अच्छी जॉब लगवा देंगे , मैं तुम्हे उनका नंबर देती हूँ

उसने इक इक कर के चार नंबर लिखवाये , मैंने मुंस्कुराते हुए लिखा और थैंक्स कह कर फ़ोन रख दिया .चारो नंबर आज भी मेरे कॉपी में लिखे है .कभी जरुरत नहीं पड़ी उन नंबर्स पर कॉल करने की . पर हा, कभी दीख जाता है तो कुरियर भी याद आ जाता है और इक हलकी सी मुस्कराहट भी आ जाती है कही से .. ...

Sunday, August 9, 2015

Martha - Story of Aadiwaasi Girl ..मुझे माफ़ करना , मार्था !!

मुझे माफ़ करना , मार्था !!

किसी ने आकर मुझे कहा की सिस्टर ज्योति ने बुलाया है अपने चैम्बर में . थोड़ा अजीब लगा की उन्हें क्या काम होगा मुझसे . सिस्टर ज्योति पढ़ाती नहीं थी , वो स्कूल के एकाउंट्स और बाकी क्रिया कलापो का धयान रखती थी . पर पता नहीं कब मुझसे इक खास रिश्ता बन गया . जब क्लास ४ में थी , तब से ही रोक कर कुछ कुछ पूछ लिया करती . इक बार तो मुझे बुलाकर पूछा " आर यू बेंगोली ?" झट से बोल दिया , जैसे इक रटे हुए तोते की तरह और बड़े कड़क अंदाज में उस छोटी सी उम्र में ( आज सोच कर हंसी आती है ) " नो सिसिटर , आय आम बिहारी , माय पापा इस पोस्टेड हियर , सो आये लिव हियर . उस समय नहीं पता था की आने वाली जीवन में मुझे कितनी बार लोगो को बताना होगा की मैं बंगाली नहीं बिहारी हूँ , ये हूँ वो हूँ ..सिस्टर ज्योति बाकी सिस्टर से अच्छी लगती ,इक खास वजह थी बहुत मधुर बोलती और सुन्दर भी थी ..मेरे से ख़ास लगाव रखती थी तो मेरे लिए गर्व की बात थी , और सबसे बड़ी बात की हिंदी माध्यम का स्कूल होते हुए भी वे मेरे से इंग्लिश में ही बात करती थी . पर उस वक्त सिस्टर ने बुलाया ये बात कही खटकने लगी . बुलाया था तो जाना ही था .
"मे आय काम इन ?'
यस ..
वो चुप रही थोड़ी देर ..मै भी चुप उन्हें घूरती रही ...वो अपने कागजो में व्यस्त थी ..अचानक सर ऊपर कर थोड़े कड़क अंदाज़ में बोला
"दीड यू से एनीथिंग तू मार्था "
"नो सिस्टर"
" बट शी वास सेइंग की ( हिंदी बोलने लगी ) की तुमने ऐसा कहा की ये आदिवासी बस तौलिया ही देंगे और कुछ नहीं अाता इन्हे ( आज भी याद नहीं की सही में क्या कहा था , पर इतना पक्का याद है की मैंने तौलिये का जिक्र किया था )
" पर सिस्टर वो मार्था को नहीं कहा , हम तो दोस्तों से बात कर रहे थे "
" बट यू सेड .."
" यस सिस्टर :
" यू शुड नोट हेव सेड .."
"बट .."
" ऐसा नहीं कहना था , उसने तुम्हे बोलते सुन लिया था , वो हर्ट हुई ..."
मैं चुप रही ..क्या बोलना कुछ समझ नहीं आ रहा था ...खुद में बुरा भी लगा , फिर मार्था पर गुस्सा भी आये ...चुप्पी कायम रही थोड़ी देर ...
कैन गो नाउ ..पर ख्याल रखना , फिर कभी ऐसी बात नहीं बोलना , किसी का दिल दुखने वाला ...फिर मुस्कुरा दी ...
मैं भारी मन से बहार आई , किसी से कुछ भी नहीं कहा और क्लास चली गई ..

ये बात उन दिनों की जब मै अपने कुछ दोस्तों के साथ वर्ग छ के आखिरी दिनों में स्कूल के सारे शिक्षको को विदाई समारोह में क्या दिया जाए इस पर टिफ़िन के वक्त, लगभग रोज कुछ विचार विमर्श करते थे दुमका के मिशन स्कूल में पढ़ते थे , वहा कुल ७५ लडकिया थी जिसमे शायद २० या २५ ही डेस्कॉलरस थी और बाकी आदिवासी लड़किये थी जो हॉस्टल में रहती थी . उन्ही में लड़कियों में इक मार्था हांसदा थी . पढ़ने लिखने में होशियार , थोड़ी एकाकी लगती, पर मैंने पाया की वो हम डेस्कॉलरस से अलग रहती और कुछ आदिवासी लड़की ( गिनी हुई ) जिनसे वो हंस कर बात करती , वरना आमतौर पर उसके शकल पर इक अजीब सी नकारात्मकता के भाव आते थे इसलिए कोई खास बात चित इक वर्ग में होते हुए भी नहीं होती . जब भी क्लास ब्रेक होता वो हॉस्टल को निकल लेती , पर उसके इस अलगावपन की वजह से जो भी मुझे दिख पड़ता मैं जरूर .धयान से देखती और समझने की कोशिश करती .

मेरे उस स्कूल में आज तक जब भी क्लास ६ की विदाई समारोह हुई थी , सरे टीचर्स को इक तौलिया दे दिया जाता था ( जो अक्सर आदवासी अपने पहनावे में प्रयोग करते थे वहा पर के ) मैंने अपने कुछ दोस्तों में ये प्रस्ताव रखा था की इसे बदला जाए तब इक दोस्त ने कहा की हॉस्टल की लडकिया नहीं मानेगी ..उसी पर शायद मैंने ये कहा था की ये सिर्फ अपना चलाते है , तौलिया ही इनके दिमाग में भरा रहता है ... मार्था ने कब सुना ये बात पता नहीं , पर मुझे उसके खबरची ने सुना होगा इसका भरोसा है .

आज मैं मार्था और खुद को देखती हूँ तो पाती हूँ की दो संस्कृति और समुदाय के बीच के रेखा के आर पार खड़े थे हम दोनों . मैं लांघना चाहती थी पर वह हर बार और दूर भाग जाती थी . ये दूरी मैंने गेम्स के पीरियड में भी महसूस किया था , उन्हें खो खो पसंद था , हमलोग तो खेल लेते पर जब कबड्डी की बारी आती तो सब धीरे धीरे हॉस्टल की तरफ खिसक जाती थी क्योकि गेम्स पीरियड अक्सर लास्ट पीरियड हुआ करता था. इक दिन कम्प्लेन करना पारा क्लास टीचर को तब जाकर वे लोग कबड्डी खेलना शुरू किया . आज उम्र और और कुछ अनुभव होने पर महसूस होता है की सब ऐसे नहीं थे , अच्छी खासी आदिवासी की हम डेस्कॉलरस लड़कियों से दोस्ती थी पर कुछ ५ - ६ लड़कियों की वजह से ये दूरिया बढ़ती जा रही थी , हमारी तरफ से कुछ डेस्कॉलरस लडकिया थी जिन्हे उन आदिवासी लड़कियों से कोई मतलब नहीं था , टीचर्स की इक गलती मानती हूँ की दोनों संस्कृति को जाने समझे ऐसा कोई माहोल नहीं बनाया .

खैर , विदाई समारोह हुआ था , मार्था भी शामिल हुई उसमे , सारे टीचर्स को इक स्टील का प्लेट , इक रूमाल और इक पेन दिया गया था और प्रिसिपल को इक बड़ा प्लेट , कटोरा , रुमाल और पेन दिया गया . जितने पैसे जमा हुए ( याद से ३०० से कुछ ज्यादा ) उसमे से ३७ रूपये बचे थे वो प्रिसिपल को दे दिया गया . सब ने पसंद किया था उस छोटे से प्रयास को .

पर हां मेरे और मार्था में दूरी बनी रही , मुझे नहीं याद फिर कभी हम सहज रूप में मिले मार्था से . पर उसे जितना समझ सके थे , वह अभी जहा भी होगी अपने पैरो पर खड़ी होगी , स्वालम्बी होगी , कहने को उसने अपनी पहचान , अपनी संस्कृति का नेम प्लेट लगा रखा था , पर वह बाकी आदिवासी लड़कियों से ज्यादा अपने समाज से बहार की चीजो को समझती थी और जानती थी की उसमे अपना हक़ कैसे और कब लेना है . उम्मीद करती हूँ की वह जहा भी होगी बाकी आदिवासी लड़कियों को भी ये गुर सिखाती होगी . मार्था , तुम्हारी उस हुनर की मैं कायल हूँ आज भी, पर हा तुम्हारा दिल दुखा अनजाने में उसका खेद है ..तहे दिल से माफ़ी मांग रही हूँ


Story of a Girl - वो लड़की ...

वो लड़की ...

समय बीतते देर नहीं लगती , पर कुछ बाते याद रहती है , कभी दिमाग से ओझल जरुर हो जाती है पर रहती है कही यादो के गलियारों में ही . अनायास कभी दस्तक दे जाती है और मुस्कुराने को विवश करती है .

आज ऐसा ही इक प्रसंग याद हो आया ,२००७ का , जब मैं पढाया करती थी , मै सुबह के दो बैच लेकर साढ़े ग्यारह बजे तक ज्यादातर घर के लिए निकल लेती थी . एक दिन जब मैं क्लास लेने के बाद निचे उतरी ही थी कि पीछे से क्लास की एक लड़की दौड़ी आई
"मैम आपसे बहुत जरुरी बात करनी है "
"हा बोलो"
"मैम पर्सनल है ..."
मुस्कुराते हुए कहा " बोलो तो "
"पता नहीं आप क्या समझिएगा , इसलिए अजीब लग रहा है , फिर लगा की आप अलग है , आप बाकी की तरह नहीं सोचियेगा ....इसलिए तो हिम्मत की आपसे बोलने की ..."
" बेफिक्र हो कर बोलो .."
" मैम वो सुन्दर ( मुझे नाम याद नहीं ) है न , वो मेरे पीछे पड़ा हुआ है , देखिये न कहता है जब तक तुम पटना में हो, यहाँ पढने आ रही हो , मै ही घर तक तुम्हे छोडूंगा ...मैम मेरा आलरेडी बॉयफ्रेंड है ,मै उसको कमिटेड हूँ मैम ..." वो मेरे से बात बात करते बहुत ही विश्वस्त लगने लगी थी , पर सच कहू मै अन्दर अन्दर ही अचरज में की ये लड़की मुझे क्या बता रही है , क्यों बता रही है , और कोई नहीं मिला ये सब बताने को .ये लड़की ग्वालियर में बायोटेक्नोलॉजी का कोर्स कर रही थी , गर्मी छूट्टी में आई थी पटना अपने घर और यहाँ इंग्लिश का इक प्रोग्राम ज्वाइन किया था जिसमे GD , प्रेजेंटेशन और गतिविधिया होती थी . अपने मन की उलझनों को इक पल में ही झटक दिया और उसे कहा " तुमने सुन्दर को बताया नहीं ये सब "
"बताया न मैम , पर वो नहीं मानता "
"क्या कहता है ?
" कहता है की मैं कहा आ रहा हूँ तुम्हारे और तुम्हारे बॉयफ्रेंड के बिच , कहता है तुम जब तक पटना में हो तबतक ही थोडा साथ चाहता हूँ एक दोस्त की तरह , फिर तुम यहाँ से चली जाउगी तो तुम्हारी और मेरी दुनिया अलग होगी "
" तुम क्या सोचती हो ? "
" मैम इसलिए तो आपके पास आई हूँ , समझ नहीं आता क्या करू , रोज घर छोड़ने के लिए वेट करता है , पर अजीब लगता है मैम , सुन्दर है बहुत अच्छा लड़का , मैम उसी ने मुझे मोटीवेट किया था एनुअल फंक्शन में एंकरिंग के लिए , मैम इतना अच्छा दे पायेंगे सोचा नहीं था , उसी ने सारे लाइन्स लिखे , कैसे कब क्या बोलना है सब उसी ने समझाया था ...सुन्दर को इस बात के लिए कभी नहीं भूल सकते . पर मैं कमिटेड हूँ मैम , मेरा बॉयफ्रेंड गुडगाँव में काम करता है ...."
"ठीक है ..जब तुम्हे अजीब लगता है , बेटर स्पस्ट बोल दो , ये मन में रोज का संशय क्यों रखना ..."
" हा मैम ...मुझे भी यही सही लगता है ...आप रुकिए न मैम , आपके साथ ही चलूंगी , आप गांधीनगर से हो कर जाती है न ..."
" हां.."
"मैं गाँधी नगर में ही रहती हूँ ...आती हूँ मैम तुरंत ..."
"ओके ...." कहते हुए कुछ कदम आगे चली थी की सामने से एक बाईक गुजरी , सुन्दर चला रहा था , और पीछे वही लड़की उसके कंधे पर हाथ रख मुस्कुरा रही थी और मुझे कुछ आँखों से इशारा कर रही थी मानो कह रही हो की सुन्दर नहीं माना ..
तबतक क्लास का एक दूसरा लड़का जो शायद उस लड़की को मेरे से बाते करते सुना या युही , आकर बोला
मैम ....इन दोनों का वेट कर रहे थे क्या .....इनका ई रोजे का काम है ...बाए मैम ..."
मै भी मुस्कुराते आगे निकल गयी ...

ये घटना गुजरे आज सात साल से ज्यादा होने को है पर जब भी याद आती है , कई सवालो से घिर जाती हूँ , गुरु शिष्यों के बिच का विश्वाश , समाज का बदलता परिवेश जहा अभी भी लड़का लड़की के बीच दोस्ती सवालो के घेरे में है .इन बातो पर चर्चा होती रहती है और होती रहेगी .

हा, उस लड़की से मेरी मुलाकात करीब दो साल पहले अचानक से हुई जब मैं ऑटो से स्टेशन जा रही थी , राजेंद्र नगर के स्तोपज पर वह दुसरे ऑटो से उतरी , मुझे देखते ही आई ,
मैम ....कितना अच्छा लग रहा है आपको देखा कर , आप कहा है ,
कैसी हो ?
ठीक हूँ मैम .... पता है मैम , मैं अगले साल फिर वहा इक महीने गयी थी , सब अच्छा था , पर आपको मिस किया मैम ...आपकी सूरत याद आती रहती ...आप क्या कर रही है ...
" कुछ अपना काम ऑनलाइन ...तुम क्या कर रही हो ...
" मैम ..मैं पटना में हूँ ...ललित नारायण से मैनेजमेंट कर रही हूँ....मैम आप अपना नंबर दीजिये ..."" में ने बताया , पर जब वह रिपीट करने लगी तो तो लगा की वो लास्ट का नंबर गलत बोली ...मैं कुछ बोलती कि ,.मेरा ऑटो तेजी से आगे बढ़ गया क्योंकी उसकी सीट भर गयी थी ....मुस्कुराते हुए उसके अभिवादन को स्वीकार किया ..."

पांच फीट दो या तीन इंच की वो न ज्यादा गोरी न ज्यादा सवाली , गोल चेहरे वाली , हमेशा बाल खुले रखने वाली , मौसमी चटर्जी सी मुस्कराहट लिए , अक्सर सफ़ेद ड्रेस में रहने वाली वो दिल की बिंदास लड़की को मैं शायद कभी भूल न पाउ .